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सेवा और सिमरन ही परम भक्ति है: रघुबीर महाराज

सिरसा। प्रभु रामलाल नर सेवा नारायण सेवा योग ट्रस्ट हुड्डा सिरसा में मासिक सत्संग के सुअवसर पर योग गुरु रघुवीर महाराज ने उपस्थित संगत को अपने संबोधन में फरमाया कि योग योगेश्वर स्वामी देवीदयाल महाराज फरमाया करते थे, सेवा और सिमरण ही परम भक्ति है। सेवा और सिमरण का जोड़ ही मनुष्य को आध्यात्मिक मार्ग में सफलता दिलवाता है। यह भक्ति मार्ग में सफलता की कुंजी है। सेवा न करो तो सिमरण करो और सिमरण न करो तो सेवा करो। अकेली सेवा काफी नहीं, ना ही अकेला सिमरण काफी है। जैसे एक पक्षी दो पंखों से उड़ता है, एक स्कूटर दो पहियों से चलता है, एक साइकिल पहियों से चलता है, वैसे ही मनुष्य भी सेवा-सिमरण के दो पंखों द्वारा भक्ति के मार्ग में उड़ान भरता है। भक्ति की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त होता है। इस सम्बन्ध में रघुवीर महाराज ने एक दृष्टांत दिया- बुल्लेशाह शाह अपने गुरु सूफी संत इनायत शाह जी के पास जाते हैं और कहते हैं कि गुरु जी मुझे कोई रब्बू (रब्ब) पाने का आसान तरीका बताओ। बुल्लेशाह जी के गुरु पनीरी (पौध) उखाड़ रहे थे, उसने जवाब दिया बुल्लैया रब्ब दा की पाना ऐथों पुट्टणा ते ऐत्थे लाणा। उसके गुरु सच्चे सूफी संत थे। रघुवीर महाराज ने कहा कि संसार व सांसारिक इच्छाओं से मन हटाकर प्रभु चरणों में लगाना ही सच्ची भक्ति है। मनुष्य का मन सांसारिक इच्छाओं व चिंताओं से मुक्त करना होगा। जब मनुष्य का मन प्रभु भक्ति में लग जाएगा तो उसकी चिंताएं और इच्छाएं अपने आप ही समाप्त व खत्म हो जाएंगी। नहीं तो उसकी चिंता व इच्छाएं कभी समाप्त नहीं हो सकती। ये ही इच्छाएं उनके जन्म-मरण का मुख्य कारण बनती हैं। रघुवीर महाराज ने आगे फरमाया कि शिरोमणि संत कबीर जी कहते हैं, जब मैं था तो हरी नहीं, अब हरी हैं तो मैं नहीं। प्रभु आरती और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस पवित्र मौके पर पृथ्वी सिंह बैनीवाल, नरेश चावला, अरुण चौधरी, अमित नरूला, पुष्कर, भारत भूषण, सुमन रानियां, जितेन्द्र चावला, विपिन, सतीश, राज चावला, फूलरानी, संगीता, मिनाक्षी शर्मा, सलोचना आदि उपस्थित थे।

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