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सरकार को यूपीआई को फ्री रखना चाहिए: सीपीआई

सिरसा। सरकार द्वारा यूपीआई पर लगाए गए चार्ज की सीपीआई ने कड़े शब्दों में निंदा की है। सीपीआई के जनरल सेक्रेटरी डी. राजा ने कहा कि यूपीआई, जो एक पब्लिक पेमेंट टेक्नोलॉजी है, के इस्तेमाल पर लगने वाले चार्ज बहुत बुरे हैं और यूएस के दबाव में इस पर काम किया गया है। सरकार दावा कर रही है कि कंज्यूमर्स से कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा, लेकिन अनुभव बताता है कि व्यापारी हमेशा कंज्यूमर्स पर नई लागत डालने के तरीके ढूंढ लेते हैं। यह तरीका भी बेतुका है। सिर्फ इसलिए कि पेमेंट 10 या 10,000 का है, कोई एक्स्ट्रा प्रोसेसिंग कॉस्ट नहीं है। एनपीसीआई एक कैश-रिच संस्था है, जिसके पास काफी कैश और इन्वेस्टमेंट हैं, और उसने सरकार को करोड़ों रुपये टैक्स के तौर पर दिए हैं। एक पब्लिक डिजिटल पेमेंट सिस्टम को फीस बनाने वाले सिस्टम में बदलने का कोई मतलब नहीं है जो आखिर में कंज्यूमर्स पर बोझ डालता है। उन्होंने कहा कि इस फैसले के संदर्भ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ने भारत के यूपीआई और जीरो-एमडीआर फ्रेमवर्क पर साफ तौर पर आपत्ति जताई है, और भारत की डिजिटल पेमेंट पॉलिसी को ट्रेड में रुकावट बताया है, क्योंकि वे घरेलू पेमेंट सिस्टम के पक्ष में हैं और अमेरिकी पेमेंट कंपनियों को नुकसान पहुंचाती हैं। वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों का सीधा इंटरेस्ट कार्ड पेमेंट को बढ़ाने और यूपीआई और रूपए को कम आकर्षक बनाने में है। 2,000 से ज्यादा के ट्रांजैक्शन यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन की कुल वैल्यू का लगभग 65 प्रतिशत होते हैं और यही वह सेगमेंट है, जिस पर अब चार्ज लग रहे हैं। मोदी सरकार एक बार फिर भारत के हितों की रक्षा करने के बजाय वर के दबाव में आ गई है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने बार-बार यूपीआई को डिजिटल इंडिया के सिंबल के तौर पर पेश किया है और विदेशी दबाव में अपनी आॅटोनॉमी छोड़ना हमारी अपनी डिजिटल सॉवरेनिटी पर एक धब्बा है। इससे आखिरकार मर्चेंट्स और कंज्यूमर्स पर बोझ पड़ेगा और विदेशी पेमेंट कॉपोर्रेशन्स के कमर्शियल फायदे पूरे होंगे। मोदी सरकार पहले ही भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम का एक बड़ा हिस्सा वॉलमार्ट के फोनपे और ऐल्फाबेट के गुगल पे को दे चुकी है, जो मिलकर लगभग 80 प्रतिशत वढक ट्रांजैक्शन प्रोसेस करते हैं। इन बड़ी कॉपोर्रेशन्स को पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के उनके बड़े इस्तेमाल और अरबों का रेवेन्यू कमाने के लिए पैसे देने के बजाय, सरकार ने मर्चेंट्स और कंज्यूमर्स पर बोझ डालना चुना है। यूपीआई को आसान, इंटरआॅपरेबल और कम लागत वाले पेमेंट देने के लिए पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर बनाया गया था। इसे विदेशी कॉपोर्रेट हितों को पूरा करने के लिए कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।  मोदी सरकार को यह जनविरोधी फैसला वापस लेना चाहिए और यूपीआई को फ्रÞी रखना चाहिए।

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